Губернатор штата Нью-Йорк Эндрю Куомо подписал законопроект, смягчающий наказание за хранение марихуаны.
Подписанный губернатором закон предусматривает штрафы, подобные штрафам за нарушения правил дорожного движения.
Человек, у которого найдут до одной унции (чуть больше 28 граммов) марихуаны, должен будет заплатить штраф в 50 долларов. За хранение марихуаны в количестве от одной до двух унций штраф установлен на уровне 200 долларов. Хранение большего количества вещества будет рассматриваться как уголовное правонарушение, но незначительное.
Кроме того, в законе прописана процедура снятия судимости с ранее осужденных в штате за хранение марихуаны. Речь идет о примерно 200 тысячах человек.
Губернатор Куомо отметил, что тяжесть действовавшего до сих пор законодательства непропорционально ложилась на небелое население штата.
Законодатели штата Нью-Йорк обсуждали возможность полной легализации травы для личного пользования, но это требовало создать в штате инфраструктуру регулирования отрасли легального распространения марихуаны, а согласовать текст соответствующего закона до конца сессии они не успели.
Губернатор Куомо ранее выступал против подобного законодательства.
Употребление марихуаны декриминализовано, в разной степени и необязательно в любых целях, в более чем 30 из 50 штатов США.
На федеральном уровне хранение марихуаны остается уголовно наказуемым. При администрации Обамы подобные дела преимущественно оставлялись на усмотрение штатов, однако при Дональде Трампе минюст рекомендовал прокурорам применять соответствующие статьи даже в штатах, где употребление марихуаны законно.
Tuesday, July 30, 2019
Monday, July 22, 2019
云南宣威农村饮水工程成摆设 10年来一滴水都没有
2019年,中央一号文件明确指出,要推进农村饮水安全巩固提升工程,加强农村饮用水水源保护,加快解决农村“吃水难”和饮水不安全的问题。
国家把解决农村饮水困难纳入了国家重大规划,多年来持续进行了数千亿的资金投入。
不过,最近央视财经《经济半小时》栏目却接到云南宣威市部分群众的举报,他们反映当地一些村庄的农村饮水工程,中看不中用,百姓喝水困难。国家投入资金修建的饮水工程,成了摆设。
今年入春以来,78岁的云南省宣威市海岱镇旧屋村村民敖大柱,每天都要到村子外面的取水点挑水吃。
在村民们口中,每年旱情最严重的一个多月,全家老小齐上阵背水吃。这样的景象,十多年间一直都在持续。
天旱导致水越来越少,这种自然现象,村民们很理解,但让村民不能理解的是,早在十年前,当地政府为了解决村里的吃水问题,修建的所谓饮水工程。
在村民的带领下,央视财经记者来到由当地政府组织修建的饮水工程的蓄水池边。蓄水池空空如也,水池的铁门早已锈迹斑斑,也没有封闭上锁。
云南省宣威市海岱镇旧屋村村民赵金富说,从2010年蓄水池建成至今,一直都是空的。
在村子里,还有另外两个标着“宣威市农村饮水安全工程”字样的蓄水池。但村民们却说,蓄水池建好后,他们一滴水也没喝过。
十年间,旧屋村村民们一直靠挑水过日子,政府部门的水利工程“形同虚设”。
在旧屋村村民敖先会家,有一截废弃的水管,一直派不上用场,家里的水表也是摆设,用水量一直为零。
也就是说,由政府修建的饮水工程在建好后的近十年间,敖先会一家确实没有用过供水工程供的水。
在云南省宣威市海岱镇旧屋村上排、下排两个村民小组,央视财经记者随机走访35户人家,调查结果显示,这些被采访的村民家里,水表用水量全部显示为零。
等不到水,旧屋村的村民们,只能自己想办法。
几年前,村民们联合起来,上山找水,自己花钱把山上取水点的水抽到村里,并修建蓄水池,将水引入各家各户。
赵金富说,村民们修建的取水点,在旧屋村后山上,有大大小小共30多处,大都在距离村寨远、地质条件差的高山上。
由于资金不足,村民们筹建的取水设备大都很简陋,存在不少的安全隐患。
守着村子里政府投资修建的农村饮水安全工程,老百姓却依旧要去四处找水、挑水,吃水问题一直是让旧屋村村民们头疼的一件难事。
赵金富带着央视财经记者来到了“农村饮水安全工程”的达桥沟水源点,央视财经记者看到,由于水量巨大,多出来的水顺着白色管道溢出来,顺沟而下。
赵金富说,“农村饮水安全工程”的达桥沟水源点一年四季有水,即便往年最干旱的时节,也水流不断。由于当地政府规定,水源点是当地农村饮水工程的取水点,村民们并不敢私自接水吃。
村民们说,当初政府许下承诺:要建饮水工程,把达桥沟的水引进村庄,解决村里的吃水问题。
但前提是,各家各户必须按人头出义务工挖水沟、埋水管。结果,沟挖了,水管也埋了,水却没有吃上。旧屋村的小组长袁玉存还以“水表安装费”的名义收了每家每户30元钱。
当央视财经记者采访到正要上山放牛的袁玉存,袁玉存却说,那年收上来的“水表安装费”共计3000多元,全都给了工程承包商孙建岗,孙建岗又把这些钱作为工钱发给了小工。
作为当初的旧屋村烤烟辅导员,袁玉存还向央视财经记者透露了一些信息:在2006年之前,旧屋村曾经大面积种植烤烟。由于缺水,2007年,镇上的烤烟站在旧屋村建设了一个烤烟用水工程,但工程建好不久,根据当地政府的统筹规划,旧屋村不再规模化种植烤烟,烤烟用水工程闲置下来。
2010年,村里要建设农村饮水安全工程,就在原来烤烟站建好的蓄水池的基础上,外面贴上瓷砖,换了牌子,改头换面,变成了现在的“宣威市农村饮水安全工程”。
根据时任旧屋村村主任敖学朝和时任村民小组长袁玉存的说法,当时工程建设没多久,大家发现水管不够,导致旧屋村上排村民小组有近半的村民家里都没有接通入户水管。
在宣威市海岱镇,央视财经记者找到了旧屋村农村饮水安全工程承包商孙建岗。孙建岗信心满满地说,当年自己承建的工程,老百姓家家户户都通了水。
国家把解决农村饮水困难纳入了国家重大规划,多年来持续进行了数千亿的资金投入。
不过,最近央视财经《经济半小时》栏目却接到云南宣威市部分群众的举报,他们反映当地一些村庄的农村饮水工程,中看不中用,百姓喝水困难。国家投入资金修建的饮水工程,成了摆设。
今年入春以来,78岁的云南省宣威市海岱镇旧屋村村民敖大柱,每天都要到村子外面的取水点挑水吃。
在村民们口中,每年旱情最严重的一个多月,全家老小齐上阵背水吃。这样的景象,十多年间一直都在持续。
天旱导致水越来越少,这种自然现象,村民们很理解,但让村民不能理解的是,早在十年前,当地政府为了解决村里的吃水问题,修建的所谓饮水工程。
在村民的带领下,央视财经记者来到由当地政府组织修建的饮水工程的蓄水池边。蓄水池空空如也,水池的铁门早已锈迹斑斑,也没有封闭上锁。
云南省宣威市海岱镇旧屋村村民赵金富说,从2010年蓄水池建成至今,一直都是空的。
在村子里,还有另外两个标着“宣威市农村饮水安全工程”字样的蓄水池。但村民们却说,蓄水池建好后,他们一滴水也没喝过。
十年间,旧屋村村民们一直靠挑水过日子,政府部门的水利工程“形同虚设”。
在旧屋村村民敖先会家,有一截废弃的水管,一直派不上用场,家里的水表也是摆设,用水量一直为零。
也就是说,由政府修建的饮水工程在建好后的近十年间,敖先会一家确实没有用过供水工程供的水。
在云南省宣威市海岱镇旧屋村上排、下排两个村民小组,央视财经记者随机走访35户人家,调查结果显示,这些被采访的村民家里,水表用水量全部显示为零。
等不到水,旧屋村的村民们,只能自己想办法。
几年前,村民们联合起来,上山找水,自己花钱把山上取水点的水抽到村里,并修建蓄水池,将水引入各家各户。
赵金富说,村民们修建的取水点,在旧屋村后山上,有大大小小共30多处,大都在距离村寨远、地质条件差的高山上。
由于资金不足,村民们筹建的取水设备大都很简陋,存在不少的安全隐患。
守着村子里政府投资修建的农村饮水安全工程,老百姓却依旧要去四处找水、挑水,吃水问题一直是让旧屋村村民们头疼的一件难事。
赵金富带着央视财经记者来到了“农村饮水安全工程”的达桥沟水源点,央视财经记者看到,由于水量巨大,多出来的水顺着白色管道溢出来,顺沟而下。
赵金富说,“农村饮水安全工程”的达桥沟水源点一年四季有水,即便往年最干旱的时节,也水流不断。由于当地政府规定,水源点是当地农村饮水工程的取水点,村民们并不敢私自接水吃。
村民们说,当初政府许下承诺:要建饮水工程,把达桥沟的水引进村庄,解决村里的吃水问题。
但前提是,各家各户必须按人头出义务工挖水沟、埋水管。结果,沟挖了,水管也埋了,水却没有吃上。旧屋村的小组长袁玉存还以“水表安装费”的名义收了每家每户30元钱。
当央视财经记者采访到正要上山放牛的袁玉存,袁玉存却说,那年收上来的“水表安装费”共计3000多元,全都给了工程承包商孙建岗,孙建岗又把这些钱作为工钱发给了小工。
作为当初的旧屋村烤烟辅导员,袁玉存还向央视财经记者透露了一些信息:在2006年之前,旧屋村曾经大面积种植烤烟。由于缺水,2007年,镇上的烤烟站在旧屋村建设了一个烤烟用水工程,但工程建好不久,根据当地政府的统筹规划,旧屋村不再规模化种植烤烟,烤烟用水工程闲置下来。
2010年,村里要建设农村饮水安全工程,就在原来烤烟站建好的蓄水池的基础上,外面贴上瓷砖,换了牌子,改头换面,变成了现在的“宣威市农村饮水安全工程”。
根据时任旧屋村村主任敖学朝和时任村民小组长袁玉存的说法,当时工程建设没多久,大家发现水管不够,导致旧屋村上排村民小组有近半的村民家里都没有接通入户水管。
在宣威市海岱镇,央视财经记者找到了旧屋村农村饮水安全工程承包商孙建岗。孙建岗信心满满地说,当年自己承建的工程,老百姓家家户户都通了水。
Tuesday, July 16, 2019
कौन हैं डीके शिव कुमार और कर्नाटक कांग्रेस के दूसरे नेताओं से वो अलग क्यों हैं?
उनकी 'बदनामी' उनके आगे चलती है. और शायद यही वजह है कि उनका चेहरा तमाम मीडिया चैनलों पर छाया हुआ. मुंबई पुलिस के अधिकारियों से बहस करते हुए और उन्हें चुनौती देते हुए.
"चाहे लाखों नारे लगाए जाएं, ये डीके शिव कुमार किसी भी चीज़ से डरने वाला नहीं है. मैं अकेला आया हूं और अकेला ही जाऊंगा."
सुनने में भले ये बात नाटकीय लग रही हो लेकिन डीके शिव कुमार अपना परिचय कुछ इसी अंदाज़ में देते हैं. कर्नाटक में डीके शिव कुमार सिर्फ़ डीके नाम से जाने जाते हैं और लोकप्रिय हैं.
उनके इस कथन की पुष्टि बीजेपी नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी करते हैं.
बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा को भंग किये जाने की मांग को लेकर धरने पर बैठे येदियुरप्पा ने मीडिया के सामने पढ़े गए अपने बयान में कहा "लोग डीके शिवकुमार की 'हरकतों' को भूले नहीं हैं. वो इस तरह के मामलों को संभालने में माहिर हैं."
येदियुरप्पा ने अपने इस बयान के समर्थन में महाराष्ट्र और गुजरात का उदाहरण भी दिया. जब शिवकुमार ने 'पार्टी हित के लिए विधायकों को पनाह दी थी.'
कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन वाली सरकार ख़तरे में है लेकिन दोनों ही पार्टियों के शीर्ष नेता या तो अपने घरों में आराम से बैठे हुए हैं या फिर यहां वहां विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन शिवकुमार इन सबसे अलग, अकेले ही मोर्चा संभाले हुए हैं.
कांग्रेस विधायक कोंडजी मोहन ने बीबीसी से कहा, "चीज़ों को देखने का उनका रवैया किसी भी दूसरे नेता से बिल्कुल अलग है. उनकी क्षमता बेहिसाब है. वो धारणाओं को तोड़ने में माहिर हैं और पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर किसी तरह का सवाल ही नहीं उठाया जा सकता."
वहीं कांग्रेस प्रचार समिति के महासचिव मिलिंद धर्मसेन कहते हैं, "मैंने उन्हें अपने स्कूल के वक़्त से देखा है. हम एक ही गांव सथनूर से हैं. लोग नतीजों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं लेकिन वो कभी किसी भी चीज़ से नहीं घबराते हैं. अगर उऩ्होंने कुछ हाथ में लिया है तो उसे पूरा करके ही रहते हैं."
जिस तरह डीके शिव कुमार ने गुजरात राज्यसभा चुनाव के दौरान देश के दूसरे सबसे शक्तिशाली राजनेता और बीजेपी अध्यक्ष से दो-दो हाथ किए थे, उस लिहाज़ से धर्मसेन का बयान कुछ हद तक सही भी लगता है.
नाम न छापने की शर्त पर उनके एक सहयोगी ने कहा, "ये अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी से सीधा-सीधा पंगा था. सभी को मालूम था कि वो बहुत बड़ा जोख़िम उठा रहे हैं और इसका भुगतान उन्हें अब तक करना पड़ रहा हैं. लेकिन वो ऐसे ही हैं..."
उन्हें बेहद नज़दीक से जानने वाले एक शख़्स ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, "वो एक बेहद ठहरे हुए इंसान हैं. महत्वाकांक्षी भी हैं और उनकी इच्छा मुख्यमंत्री बनने की भी है. वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. उनका मानना है कि उनकी किस्मत में कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनना लिखा है."
धर्मसेन भी कहते हैं कि उनका अंदाज़ ऐसा ही रहा है.
वो कहते हैं "उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए अपनी ज़मीन गिरवी रखी. साल 1985 में उन्होंने बतौर कांग्रेस उम्मीदवार सथानूर (बैंगलोर ग्रामीण जिले से) के युवाओं को एकजुट करने का काम किया. हालांकि वो एचडी देवगौड़ा के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं जीत सके."
पांच साल बाद कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया. शिवकुमार ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव पर लड़ा और इतिहास भी रचा. वोक्कालिगा समुदाय के मज़बूत दावेदार देवेगौड़ा हार गए. फिर दस साल बाद, शिवकुमार ने विधानसभा में देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को हराया.
और उसके बाद उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल मचाते हुए उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में कनकपुरा लोकसभा सीट से अनुभवहीन तेजस्विनी को खड़ा कराकर देवगौड़ा को मात दी.
लेकिन इसके बाद भी जब पार्टी ने जेडीएस और देवगौड़ा परिवार से हाथ मिलाकर कर्नाटक में गठबंधन सरकार बनाने का फ़ैसला किया तो उन्होंने एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह पार्टी के फ़ैसले को स्वीकार कर लिया.
उनके साथ काम कर चुके कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि उन्होंने सालों से चली आ रही देवगौड़ा परिवार और वोक्कालिगा समुदाय के प्रति बनी विरोधी छवि को एक पल में ख़त्म कर दिया. इसका मतलब ये हुआ कि उन्हें ये लगता है कि जब उन्हें ज़रूरत पड़ेगी तो वो भी उनका साथ देंगे.
भविष्य को लेकर निवेश
वो हमेशा से भविष्य में निवेश करने का रवैया रखते हैं. धर्मसेन कहते हैं "उन्होंने मुझसे कहा था कि मूर्ख मत बनो और ज़मीन में निवेश करो. केवल ज़मीन ही है जो अच्छा रिटर्न देगी. उन्होंने ख़ुद ऐसी कई जगहों पर जमीनें खरीदीं जो उस वक़्त बिल्कुल वीरान थीं लेकिन उनकी दूरदर्शिता ही थी कि कुछ सालों बाद वो ज़मीनें क़ीमती हो गईं."
एक पुराने कांग्रेसी नेता एलएन मूर्ति कहते हैं, "उनके परिवार के पास कनकपुरा में कुछ ज़मीन थी. फिर जब वो 80 के दशक में मेरे सहायक बनकर काम करने आए तो उनका अपना काम करने का तरीक़ा था. वो बहुत मेहनती हैं. बहुत से लोगों को लगता है कि वो थोड़े झगड़ालू किस्म के हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. उनके ख़िलाफ़ एक भी मामला दर्ज नहीं है. वो बेहद ज़मीनी हैं और उनका व्यक्तित्व भी वैसा ही है." तो ऐसे में जब उन्होंने मुंबई पुलिस से यह कहा कि उनके पास कोई हथियार नहीं है सिर्फ़ एक दिल है तो उनका यक़ीन किया जाना चाहिए था.
बीजेपी में शामिल हो चुकीं तेजस्विनी गौड़ा कहती हैं "अगर वो दूसरों को आगे बढ़ाते तो वे मुख्यमंत्री होते. वह किसी और को आगे बढ़ता देख पचा नहीं सकते हैं. मैं अपने बारे में ये बात नहीं कर रही हूं. योगेश्वर या एसटी सोमशेखर को ही देख लें. वो अपने अहंकार से उबर नहीं पाते हैं."
लेकिन, कांग्रेस पार्टी में ऐसे कई लोग हैं जो अब भी मानते हैं कि वे किसी न किसी दिन मुख्यमंत्री ज़रूर बनेंगे.
जब उन्होंने राजनीति में क़दम रखा था तो वो सिर्फ बारहवीं पास थे.
साल दर साल पढ़ाई करते हुए उन्होंने राजनीति शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन कर लिया. उन्होंने संस्कृत के श्लोक भी पढ़ने सीखे. इसके अलावा 12वीं शताब्दी के संत बासवाना के वचन भी सीखे, जिन्हें उत्तरी कर्नाटक में मानने वाली एक बड़ी आबादी है.
डीके शिवकुमार को ख़ुद भी यक़ीन है कि उनका समय आएगा. क्योंकि उनका मानना और कहना है कि वो अब भी युवा हैं. वो महज़ 57 साल के हैं.
"चाहे लाखों नारे लगाए जाएं, ये डीके शिव कुमार किसी भी चीज़ से डरने वाला नहीं है. मैं अकेला आया हूं और अकेला ही जाऊंगा."
सुनने में भले ये बात नाटकीय लग रही हो लेकिन डीके शिव कुमार अपना परिचय कुछ इसी अंदाज़ में देते हैं. कर्नाटक में डीके शिव कुमार सिर्फ़ डीके नाम से जाने जाते हैं और लोकप्रिय हैं.
उनके इस कथन की पुष्टि बीजेपी नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी करते हैं.
बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा को भंग किये जाने की मांग को लेकर धरने पर बैठे येदियुरप्पा ने मीडिया के सामने पढ़े गए अपने बयान में कहा "लोग डीके शिवकुमार की 'हरकतों' को भूले नहीं हैं. वो इस तरह के मामलों को संभालने में माहिर हैं."
येदियुरप्पा ने अपने इस बयान के समर्थन में महाराष्ट्र और गुजरात का उदाहरण भी दिया. जब शिवकुमार ने 'पार्टी हित के लिए विधायकों को पनाह दी थी.'
कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन वाली सरकार ख़तरे में है लेकिन दोनों ही पार्टियों के शीर्ष नेता या तो अपने घरों में आराम से बैठे हुए हैं या फिर यहां वहां विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन शिवकुमार इन सबसे अलग, अकेले ही मोर्चा संभाले हुए हैं.
कांग्रेस विधायक कोंडजी मोहन ने बीबीसी से कहा, "चीज़ों को देखने का उनका रवैया किसी भी दूसरे नेता से बिल्कुल अलग है. उनकी क्षमता बेहिसाब है. वो धारणाओं को तोड़ने में माहिर हैं और पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर किसी तरह का सवाल ही नहीं उठाया जा सकता."
वहीं कांग्रेस प्रचार समिति के महासचिव मिलिंद धर्मसेन कहते हैं, "मैंने उन्हें अपने स्कूल के वक़्त से देखा है. हम एक ही गांव सथनूर से हैं. लोग नतीजों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं लेकिन वो कभी किसी भी चीज़ से नहीं घबराते हैं. अगर उऩ्होंने कुछ हाथ में लिया है तो उसे पूरा करके ही रहते हैं."
जिस तरह डीके शिव कुमार ने गुजरात राज्यसभा चुनाव के दौरान देश के दूसरे सबसे शक्तिशाली राजनेता और बीजेपी अध्यक्ष से दो-दो हाथ किए थे, उस लिहाज़ से धर्मसेन का बयान कुछ हद तक सही भी लगता है.
नाम न छापने की शर्त पर उनके एक सहयोगी ने कहा, "ये अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी से सीधा-सीधा पंगा था. सभी को मालूम था कि वो बहुत बड़ा जोख़िम उठा रहे हैं और इसका भुगतान उन्हें अब तक करना पड़ रहा हैं. लेकिन वो ऐसे ही हैं..."
उन्हें बेहद नज़दीक से जानने वाले एक शख़्स ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, "वो एक बेहद ठहरे हुए इंसान हैं. महत्वाकांक्षी भी हैं और उनकी इच्छा मुख्यमंत्री बनने की भी है. वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. उनका मानना है कि उनकी किस्मत में कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनना लिखा है."
धर्मसेन भी कहते हैं कि उनका अंदाज़ ऐसा ही रहा है.
वो कहते हैं "उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए अपनी ज़मीन गिरवी रखी. साल 1985 में उन्होंने बतौर कांग्रेस उम्मीदवार सथानूर (बैंगलोर ग्रामीण जिले से) के युवाओं को एकजुट करने का काम किया. हालांकि वो एचडी देवगौड़ा के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं जीत सके."
पांच साल बाद कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया. शिवकुमार ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव पर लड़ा और इतिहास भी रचा. वोक्कालिगा समुदाय के मज़बूत दावेदार देवेगौड़ा हार गए. फिर दस साल बाद, शिवकुमार ने विधानसभा में देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को हराया.
और उसके बाद उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल मचाते हुए उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में कनकपुरा लोकसभा सीट से अनुभवहीन तेजस्विनी को खड़ा कराकर देवगौड़ा को मात दी.
लेकिन इसके बाद भी जब पार्टी ने जेडीएस और देवगौड़ा परिवार से हाथ मिलाकर कर्नाटक में गठबंधन सरकार बनाने का फ़ैसला किया तो उन्होंने एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह पार्टी के फ़ैसले को स्वीकार कर लिया.
उनके साथ काम कर चुके कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि उन्होंने सालों से चली आ रही देवगौड़ा परिवार और वोक्कालिगा समुदाय के प्रति बनी विरोधी छवि को एक पल में ख़त्म कर दिया. इसका मतलब ये हुआ कि उन्हें ये लगता है कि जब उन्हें ज़रूरत पड़ेगी तो वो भी उनका साथ देंगे.
भविष्य को लेकर निवेश
वो हमेशा से भविष्य में निवेश करने का रवैया रखते हैं. धर्मसेन कहते हैं "उन्होंने मुझसे कहा था कि मूर्ख मत बनो और ज़मीन में निवेश करो. केवल ज़मीन ही है जो अच्छा रिटर्न देगी. उन्होंने ख़ुद ऐसी कई जगहों पर जमीनें खरीदीं जो उस वक़्त बिल्कुल वीरान थीं लेकिन उनकी दूरदर्शिता ही थी कि कुछ सालों बाद वो ज़मीनें क़ीमती हो गईं."
एक पुराने कांग्रेसी नेता एलएन मूर्ति कहते हैं, "उनके परिवार के पास कनकपुरा में कुछ ज़मीन थी. फिर जब वो 80 के दशक में मेरे सहायक बनकर काम करने आए तो उनका अपना काम करने का तरीक़ा था. वो बहुत मेहनती हैं. बहुत से लोगों को लगता है कि वो थोड़े झगड़ालू किस्म के हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. उनके ख़िलाफ़ एक भी मामला दर्ज नहीं है. वो बेहद ज़मीनी हैं और उनका व्यक्तित्व भी वैसा ही है." तो ऐसे में जब उन्होंने मुंबई पुलिस से यह कहा कि उनके पास कोई हथियार नहीं है सिर्फ़ एक दिल है तो उनका यक़ीन किया जाना चाहिए था.
बीजेपी में शामिल हो चुकीं तेजस्विनी गौड़ा कहती हैं "अगर वो दूसरों को आगे बढ़ाते तो वे मुख्यमंत्री होते. वह किसी और को आगे बढ़ता देख पचा नहीं सकते हैं. मैं अपने बारे में ये बात नहीं कर रही हूं. योगेश्वर या एसटी सोमशेखर को ही देख लें. वो अपने अहंकार से उबर नहीं पाते हैं."
लेकिन, कांग्रेस पार्टी में ऐसे कई लोग हैं जो अब भी मानते हैं कि वे किसी न किसी दिन मुख्यमंत्री ज़रूर बनेंगे.
जब उन्होंने राजनीति में क़दम रखा था तो वो सिर्फ बारहवीं पास थे.
साल दर साल पढ़ाई करते हुए उन्होंने राजनीति शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन कर लिया. उन्होंने संस्कृत के श्लोक भी पढ़ने सीखे. इसके अलावा 12वीं शताब्दी के संत बासवाना के वचन भी सीखे, जिन्हें उत्तरी कर्नाटक में मानने वाली एक बड़ी आबादी है.
डीके शिवकुमार को ख़ुद भी यक़ीन है कि उनका समय आएगा. क्योंकि उनका मानना और कहना है कि वो अब भी युवा हैं. वो महज़ 57 साल के हैं.
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